भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय (विभूति योग) में अपने दिव्य स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन करते हैं।
यह अध्याय हमें यह समझाता है कि परमात्मा को स्मरण करने से जीवन में पूर्णता, संतोष और शांति कैसे आती है।
श्रीकृष्ण कहते हैं—
“मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च”
अर्थात—
जो भक्त निरंतर मुझमें मन लगाते हैं,
अपने प्राण मुझमें अर्पित कर देते हैं,
आपस में मेरी चर्चा करते हैं,
मेरे गुणों और प्रभाव का कथन करते हैं—
वे सदैव संतुष्ट और आनंदित रहते हैं।
पूर्णता की खोज क्यों है?
हम सब जीवन में पूर्णता (Perfection) चाहते हैं।
घर की चादर थोड़ी टेढ़ी हो,
बच्चे के एक विषय में कम नंबर आ जाएँ,
या जीवन में एक छोटी-सी कमी दिख जाए—तो हमारा मन वहीं अटक जाता है।
क्यों?
क्योंकि हम स्वयं पूर्ण से उत्पन्न हुए हैं।
उपनिषद कहते हैं—
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं,पूर्णात् पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय,पूर्णमेवावशिष्यते”
अर्थ—
वह परमात्मा पूर्ण है, यह सृष्टि भी पूर्ण है,
पूर्ण से ही पूर्ण उत्पन्न होता है,
और पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
इसलिए अपूर्णता हमें खटकती है,क्योंकि पूर्णता हमारा मूल स्वभाव है।
माया का कार्य क्या है?
माया का कार्य है— हमें यह अनुभव कराना कि हम अधूरे हैं।
क्योंकि जब तक अभाव का अनुभव न हो, पूर्णता का मूल्य समझ में नहीं आता।
जैसे—
जो हमेशा अमीर रहा हो,वह गरीबी को नहीं समझ सकता।
जो खट्टा कभी न चखे,वह मीठे का स्वाद नहीं जान सकता।
इसीलिए यह संसार एक अनुभवशाला है।
मन कहाँ लगा है— अधूरापन या परमात्मा?
अब स्वयं से पूछिए—
आपका मन बार-बार कमी पकड़ता है?
या आप परमात्मा की पूर्णता में मन लगाते हैं?
जिसका मन अधूरेपन पर टिका रहता है,
वह भीतर से अधूरा ही रहता है।
और जो मन को परमात्मा में स्थिर करता है,
उसके भीतर धीरे-धीरे संतोष, शांति और आनंद उतरने लगता है।
भक्ति और ज्ञान— अलग नहीं, पूरक हैं
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं—
“तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते”
अर्थ—
जो भक्त प्रेमपूर्वक निरंतर मेरा भजन करते हैं,
उन्हें मैं बुद्धियोग (तत्त्वज्ञान) प्रदान करता हूँ,
जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।
👉 भक्ति से ज्ञान मिलता है
👉 ज्ञान से भक्ति गहरी होती है
दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं,एक-दूसरे के पूरक हैं।
ज्ञान मार्ग में खोज है— “मैं कौन हूँ?”
भक्ति मार्ग में समर्पण है— “सब तू ही है”
दोनों अंततः
एक ही सत्य तक पहुँचाते हैं।
परमात्मा कहाँ है?
किसी के लिए वह साकार हैं—गुरु, इष्ट, आराध्य
किसी के लिए निराकार—आकाश की तरह सर्वव्यापक
दिन में कभी-कभी आकाश की ओर देखिए और कहिए—
“वह इस आकाश में है और मैं उसी में हूँ।”
यह भाव अत्यंत सुंदर और गहरा है।
जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य यदि इस जीवन में
हमने परमात्मा को नहीं जाना, तो चाहे कितनी भी
संपत्ति, सम्मान, सुविधाएँ मिल जाएँ—अंततः जीवन खाली रह जाता है।
इसलिए प्रार्थना है—
इसी जीवन में मुक्त होने का प्रयास करें
मन को बार-बार प्रभु में लगाएँ दिन में कई बार स्मरण करें
कृतज्ञता में जिएँ,जहाँ भक्ति होगी, वहाँ ज्ञान अपने आप प्रकट होगा।