”बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।“
मनुष्य का जीवन चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्तम और दुर्लभ माना गया है। यह मात्र संयोग नहीं, बल्कि पिछले कर्मों के पुण्य से प्राप्त हुआ एक ऐसा सोद्देश्य अवसर है, जिसके द्वारा हम जीवन के परम लक्ष्य यानी मोक्ष या आत्मिक उन्नति को प्राप्त कर सकते हैं। हमारा प्रस्तुत पाठ इसी सत्य को अत्यंत सरल और मार्मिक ढंग से उजागर करता है।
1. 😇 मनुष्य जन्म की दुर्लभता
पाठ की शुरुआत इस सत्य से होती है कि मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है। इसे हम उस उदाहरण से समझ सकते हैं, जहाँ गलियों में भटकने वाले आवारा पशुओं को कभी मनुष्य जीवन मिला था। वे कोई साधारण मनुष्य नहीं थे, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर जैसे बुद्धिजीवी और सफल व्यक्ति थे। उन्हें जीवन में सब कुछ प्राप्त था, सिवाय समय के। जब उनके गुरुजनों ने उन्हें ईश्वर का भजन और सत्संग करने को कहा, तो उनका एक ही जवाब था—”हमारे पास टाइम नहीं है।” इस अहंकार और टालमटोल ने उन्हें उनके सबसे बड़े खजाने से वंचित कर दिया।
2. 🐕 कर्मों का अटल परिणाम
समय की कद्र न करने और धर्म अनुसार आचरण (ईश्वर का धन्यवाद, भजन, सत्संग) न करने का परिणाम यह हुआ कि वे अपना मनुष्य जन्म हार गए और उन्हें पशु योनि (animal life) में जन्म लेना पड़ा।
वे मनुष्य जन्म हार गए।
…पशु योनि में आ गए अब देखो समय ही समय है। बेचारे गली गली आवारा घूमते हैं।
अब उनके पास संसार के लिए भले ही ‘समय ही समय’ हो, लेकिन उस समय का उपयोग वे आत्म-कल्याण के लिए नहीं कर सकते। वे केवल गलियों में दुख, दुत्कार और फटकार सहते हैं, जो उनके अतीत के कर्मों का फल है। यह उदाहरण हमें चेतावनी देता है कि कर्मों का हिसाब अटल है; वे किसी को नहीं छोड़ते और उनका फल बहुत रुला देता है।
3. ✨ समय की कमी और सदुपयोग का संदेश
पाठ का केंद्रीय संदेश यह है कि यदि हम अभी भी इस सत्य को नहीं समझेंगे, तो कब समझेंगे? मनुष्य जीवन क्षणभंगुर है और हमारे पास अपने ढेर सारे कर्मों को धोने के लिए बहुत कम समय है।
यहीं पर पाठ हमें सही मार्ग दिखाता है:
भजन और सत्संग: यह मन को एकाग्र करने और ईश्वरीय चेतना से जुड़ने का मुख्य साधन है।
भगवान का धन्यवाद (Gratitude): प्रत्येक श्वास और साधन के लिए आभार व्यक्त करना हमारे कर्मों को हल्का करता है।
विचार और चिंतन: हमें जीवन की क्षणभंगुरता पर विचार करना चाहिए और अपने उद्देश्य को याद रखना चाहिए।
परिवार सहित प्रयास: यह कार्य व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक है। परिवार सहित भजन-सत्संग करने से पूरे घर का वातावरण शुद्ध होता है।
4. 🎯 निष्कर्ष
मनुष्य जन्म एक प्रयोगशाला है, जहाँ हम अपने विवेक (बुद्धि) और स्वतंत्र इच्छाशक्ति का उपयोग करके अपने भाग्य को बदल सकते हैं। यह कर्मों के जाल से मुक्त होने का एकमात्र द्वार है। हमें पशुओं के उदाहरण से सीख लेनी चाहिए कि सफलता, पद या संपत्ति कोई मायने नहीं रखती, यदि हमने अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य यानी आत्म-कल्याण को भुला दिया।
अतः, हमें चाहिए कि हम इस दुर्लभ अवसर को व्यर्थ न गंवाएँ और समय की कमी को समझते हुए, परिवार सहित भजन, सत्संग और धन्यवाद के मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाएँ।
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