“मैं कौन हूँ?”
यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि आत्मा की सबसे गहरी पुकार है।
हम जीवनभर अपने नाम, रिश्तों, शरीर और संसार में स्वयं को खोजते रहते हैं
परंतु वास्तविक पहचान इन सबसे कहीं अधिक गहरी होती है।
हम केवल यह नश्वर शरीर नहीं हैं,
न ही क्षण-क्षण बदलने वाले विचार और भावनाएँ।
हम अपने भीतर विद्यमान उस दिव्य चेतना के अंश हैं
जो सदा शांत, निर्मल, प्रकाशमय और अनंत है।
जब मन संसार की भीड़ और शोर से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है,
तब आत्मा धीरे-धीरे अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगती है।
वह अनुभव होने लगता है कि जिस सुख और शांति को हम बाहर खोज रहे थे,
वह तो सदैव हमारे भीतर ही विद्यमान थी।
अपने भीतर की चेतना को पहचानना ही
जीवन का वास्तविक जागरण है।
यही पहचान हमें भय से विश्वास की ओर,
अशांति से शांति की ओर,
और अज्ञान से आत्मप्रकाश की ओर ले जाती है।
आइए, कुछ क्षण स्वयं से मिलें…
और अपने भीतर बसे उस दिव्य प्रकाश को अनुभव करें,
जो सदैव से हमारा वास्तविक स्वरूप है।